11 महीने, 73 केस… कौन सुनेगा?
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय की सुरक्षा पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
ताज़ा मामला सामने आया है जहाँ घर के सामने से एक हिंदू मां और उसकी बेटी को अगवा कर लिया गया। यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि एक डरावना सिलसिला बन चुका है।
आंकड़े चौंकाने वाले हैं।बीते 11 महीनों में पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों और महिलाओं के अपहरण के 73 मामले दर्ज किए गए हैं।
इन मामलों में सबसे ज़्यादा शिकार कम उम्र की लड़कियाँ और महिलाएँ हो रही हैं।आरोप है कि पहले अपहरण फिर जबरन धर्मांतरण और बाद में जबरन निकाह यह सब एक संगठित पैटर्न के तहत हो रहा है।

पीड़ित परिवारों का कहना है कि
- पुलिस शिकायत लेने से कतराती है
- आरोपियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती
- अदालतों में भी न्याय की राह मुश्किल बना दी जाती है
डर और असुरक्षा के माहौल में हिंदू परिवार पलायन को मजबूर हैं।
“हम अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से डरते हैं”
“घर के बाहर निकलना भी खतरे से खाली नहीं”
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
❓ क्या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सिर्फ कागज़ों तक सीमित है?
❓ आखिर कब रुकेगा धर्म के नाम पर यह ज़ुल्म?
मानवाधिकार संगठनों ने इन घटनाओं पर गहरी चिंता जताई है,लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी वही है —
डर, अपहरण और बेबसी।
