“आमिर खान की इस फिल्म ने बदल दी लाखों बच्चों की ज़िंदगी”
कभी-कभी एक फिल्म, सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं होती… वो आईना बन जाती है समाज का… एक खिड़की, जो हमें दिखाती है वो दुनिया, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।”
“2007 में आई आमिर खान की फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’ ऐसी ही एक खिड़की थी… जिसने स्पेशल बच्चों की दुनिया को हमारी आंखों के सामने रख दिया… बिना किसी मेलोड्रामा के… बिना ज़्यादा शोर के… सिर्फ सच्चाई के साथ।”ईशान अवस्थी – एक 8 साल का बच्चा, जो दुनिया को कुछ अलग नजर से देखता है। उसे शब्द नाचते दिखते हैं, गणित की गिनती डराती है, लेकिन उसकी कल्पनाएं उड़ान भरती हैं रंगों में, पानी में, बादलों में।”
“डिस्लेक्सिया – एक ऐसा शब्द जो शायद पहले लोगों ने सुना भी नहीं था, वो भी इस फिल्म की बदौलत आम बात बनने लगी।
भारत में लाखों बच्चे ऐसी ही चुनौतियों से जूझ रहे हैं। उन्हें ‘धीमा’, ‘नालायक’ या ‘जिद्दी’ कह दिया जाता है… लेकिन शायद कोई नहीं समझता कि वो एक अलग भाषा बोलते हैं – समझ की, संवेदनाओं की, और मौन प्रतिभा की।”
“इस फिल्म ने न सिर्फ स्पेशल बच्चों की बात की… बल्कि ये भी दिखाया कि सही गाइडेंस, सही टीचर और थोड़ा सा प्यार… क्या कमाल कर सकता है।आमिर खान ने इस फिल्म को सिर्फ डायरेक्ट नहीं किया… उन्होंने इसे जिया। राम शंकर निकुंभ जैसे टीचर का किरदार हर उस व्यक्ति को एक मिसाल देता है जो शिक्षा से जुड़ा है।”
“फिल्म का संगीत, गाने – ‘माँ’, ‘खिलते हैं गुल यहां’ – आज भी आंखें नम कर देते हैं।
“‘तारे ज़मीन पर’ एक फिल्म नहीं थी, वो एक आंदोलन थी। उसने पैरेंट्स, टीचर्स और पूरे सिस्टम को एक बार सोचने पर मजबूर कर दिया कि हर बच्चा यूनिक होता है।”
“और शायद… सबसे जरूरी ये समझना है कि हर बच्चा एक सितारा है… जो बस अपनी रोशनी में चमकने के मौके का इंतज़ार कर रहा है।”
