अब ‘सेवा तीर्थ’ कहलाएगा प्रधानमंत्री कार्यालय…
देश की प्रशासनिक व्यवस्थाओं में एक ऐतिहासिक बदलाव किया गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), जिसे अब तक देश की नीति-निर्धारण और शीर्ष प्रशासन का प्रमुख केंद्र माना जाता था, उसका नाम बदलकर ‘सेवा तीर्थ’ कर दिया गया है। इस नए नाम के पीछे सरकार का उद्देश्य PMO की छवि को एक ऐसी संस्था के रूप में प्रस्तुत करना है, जो सत्ता नहीं, बल्कि सेवा की भावना से संचालित हो।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह बदलाव केवल नाम का नहीं बल्कि दृष्टिकोण का प्रतीक है। प्रधानमंत्री कार्यालय शुरू से ही देश की नीतियों, योजनाओं और निर्णयों का केंद्र बिंदु रहा है, लेकिन अब इसे “सेवा केंद्रित शासन” की पहचान के साथ जोड़ा जा रहा है।

क्यों चुना गया नाम ‘सेवा तीर्थ’?
नए नाम में दो शब्द शामिल हैं—
- सेवा, जो सरकार के ‘जनसेवा सर्वोपरि’ मंत्र को दर्शाता है।
- तीर्थ, जिसे भारतीय परंपरा में पवित्र, महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक स्थल माना जाता है।
इस तरह, ‘सेवा तीर्थ’ एक ऐसे स्थान का संकेत देता है जहां निर्णय शक्ति नहीं, बल्कि सेवा का भाव सबसे आगे रखा जाता है।
PMO की भूमिका पर संदेश
नाम बदलने के फैसले का उद्देश्य जनता को यह संदेश देना है कि PMO केवल आदेश देने वाला केंद्र नहीं, बल्कि देश के विकास, प्रशासन और आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान का स्थल है।
नई पहचान के जरिए सरकार चाहती है कि PMO को “भागीदारी और पारदर्शिता के प्रतीक” के रूप में देखा जाए।

नई पहचान में क्या-क्या शामिल हो सकता है?
हालांकि सरकार की ओर से विस्तृत दिशानिर्देश अभी आने बाकी हैं, लेकिन अपेक्षा है कि:
- PMO की सभी आधिकारिक संचार में ‘सेवा तीर्थ’ नाम का उपयोग होगा।
- लोगो और प्रतीक चिह्न में बदलाव किया जा सकता है।
- नागरिकों से जुड़े कार्यक्रमों में सेवा और सहभागिता आधारित मॉडल को और मजबूत किया जाएगा।
संदेश स्पष्ट—शक्ति नहीं, सेवा प्राथमिकता
इस बदलाव के जरिए सरकार यह दिखाना चाहती है कि शासन की असली नींव “शक्ति प्रदर्शन” नहीं, बल्कि “सेवा” है।
‘सेवा तीर्थ’ नाम इस दर्शन को औपचारिक रूप से स्थापित करता है और आने वाले समय में यह देश के प्रशासनिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज हो सकता है।
