भोपाल-इंदौर पैसेंजर ट्रेन ब्लास्ट मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
जबलपुर
मार्च 2017 में भोपाल-इंदौर पैसेंजर ट्रेन की एक बोगी में हुए विस्फोट के मामले में गिरफ्तार 17 वर्षीय आरोपी को वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करना होगा। हाईकोर्ट के जस्टिस संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि नाबालिग आरोपी पर बाल न्यायालय में, लेकिन वयस्क की तरह ट्रायल चलेगा। कोर्ट ने यह निर्णय जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और एनआईए एक्ट 2008 की परस्पर व्याख्या के बाद सुनाया।
इस धमाके की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने की थी और आरोपी पर यूएपीए, आईपीसी, रेलवे एक्ट और अन्य कानूनों की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। NIA ने आरोप पत्र दाखिल करते हुए किशोर समेत अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
मामले में आरोपी किशोर की ओर से विशेष न्यायालय में आवेदन दिया गया था, जिसमें उसकी उम्र 18 से कम होने के चलते केस को किशोर न्याय बोर्ड में भेजने की मांग की गई। बोर्ड ने उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का मूल्यांकन कर यह पाया कि वह अपराध के नतीजों को समझने में सक्षम था। इसके आधार पर केस को बाल न्यायालय में स्थानांतरित कर वयस्क के तौर पर ट्रायल की अनुमति दी गई।
मामले की सुनवाई को लेकर यह सवाल उठा कि क्या ट्रायल एनआईए अधिनियम के तहत विशेष न्यायालय में चले या फिर बाल न्यायालय में। कोर्ट मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे ने तर्क दिया कि जेजे एक्ट, 2015 की धारा 18(3) के अनुसार, बोर्ड यह आदेश दे सकता है कि बच्चे पर वयस्क की तरह मुकदमा चले और केस बाल न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है।
हाईकोर्ट ने दी स्पष्ट व्याख्या
कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, एनआईए अधिनियम 2008 पर अधिक प्रभावी है। विशेष रूप से जेजे एक्ट की धारा 1(4) के तहत, यदि कोई नाबालिग गंभीर अपराध में संलिप्त पाया जाता है और बोर्ड उसे वयस्क की तरह मुकदमा चलाने योग्य मानता है, तो मुकदमा बाल न्यायालय में ही चलेगा, भले ही अपराध एनआईए एक्ट के तहत अनुसूचित हो।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एनआईए अधिनियम की धारा 13 अन्य कानूनों की तुलना में केवल दंड प्रक्रिया संहिता पर अधिक प्रभावी है, न कि जेजे एक्ट पर। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कोर्ट मित्र अनिल खरे के कानूनी ज्ञान और विश्लेषण के लिए विशेष धन्यवाद प्रकट किया।
